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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

लाल पत्थर

देखता हूँ मै इन हाथों को रहरहकर,
लकिन इन्होने ही थामा था, उसे मगर,
यादों को उसकी रखता हूँ इस कदर,
लगी रहती हैं प्यास पहर पहर!
मेरे खून से घुले हुये ये पत्थर,
कुछ कहते है, किले के लाल पत्थर से,
तेरे वफा का रंग भी लाल है,
मगर मुझपर बेवफाई का रंग है!
इन पत्थरों ने देखा है, मरते लोगों को वफाई पर,
आज ये रों रही है उनकी बेवफाई पर,
महफिलों ये समां बांधती थी ज़ो पत्थर,
आज मजबूर है क्रंदन करने पर!
पैरों से घिस कर कोमल हुये ये पत्थर,
कहते है मुझे उस वेवफा को मत याद कर,
ये लाल पत्थर तू जान लेले मेरा,अगर
कहीं वो न आ जाये मेरे कब्र पर,
gul sarminda था मेरे कब्र पर,
रों rahae the लाल पत्थर .......!

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