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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

अनजान है ये

कितने अनजान है ये पत्ते,
जो अपने जड़ को नहीं जानते है ,
नीचे भेअद रहा शजड़ कोई,
फिर भी ये पते हंसते है,
क्या मौसम था और कैसा बयार था,
क्या बाजार था और कैसे खरीदार थे,
मायूस था फल फूल और माली,
मगर बिक रहे थे पत्ते,
चांह था मैने दश्त मे घुसन,
जब हों रहे कत्लायम थे,
बच न पाया मै काल से क्यौकी कदमों तले चीख जो रहे थे पत्ते,
मौसमे बहार आयीं,
हंस के आ रहे थे पत्ते,
अब खिजा की साखियो शजड़ ,
न थे पर और न थीउडने का हुनर,
शजड़ जमीन से देख रंहा था फलक ,
हवा की बदौलत चूम रहे थे फलक पत्ते,
ये बेजान मूक तो कभी अधमरे पत्ते ,
कुछ हम भी है इसी कदर,
कुछ आस मिली तो उड़ते है हों सजग,
उमीदों की पांख फैलाये उड़ते है,
कभी इस चमन तो कभी उस चमन!

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