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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

LEKCHAY

क्या सोच रहा है, तू इस कदर सर झुका कर,
सोचना है तो लक्ष्य को ध्यान कर!
भटक के चले जायंगे ये सभी,
नैनों की संत्रन्गियो मै ना ULAJHA कर!
आंख खुलेगी तो डर जाओगे,
सपनो की समंदर मे मत डूबा कर !
रहबर समझगे तुझे सब राहगीर,
यू ना अपनी राह को बदलकर !
शर्मा जाते है राहागुजर भी,
राह को यूँ देर तक न देखा कर!
दरिया को देख, न जाने कब से बह रही है ,
बताता है समय, तुझे कह कर!
बहुरुपेया है TAIRA पर्दा भी,
मत अपना समझने की भूल कर ना!
अजब रिश्ता है उसका, साथ तेरे,
इस बात को तू समझा कर!
यकीन उसपे भी आयेगा
पहले खुद पर भरोसा कर!
हिमालय को ललकार रहा है ,
ये पर्वत ढह- ढह कर !
पैर बन जाये न पत्थर कही,
जादूनगरी से बच कर गुजरा कर!
ज़माने से सह रहा है जिसे तू ,
हो सके तो उस सजा से प्यार कर!
रात गहरी है कदम जख्मी है,
चलना है अभी दूर तक, होसला बुलन्द कर !

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